Friday, 15 May 2020

"मेरी आवाज़ ही पहचान है...Magicians of Voice"




उन दिनों रात के पौने नौ बजते ही घर में अघोषित कर्फ्यू लग जाता था। घर के बच्चों को इस दौरान उधम मचाने की सख्त मनाही थी।परिवार के बड़े लोग मेज के चारों तरफ कुर्सियां डाल कर बैठ जाते थे, जिस पर पारिवारिक रेडियो चालू अवस्था में रहता था।ठीक पौने नौ बजे एक धीर गंभीर,रौबीली आवाज गूंजती थी "ये आकाशवाणी है अब आप देवकीनंदन पांडेय से समाचार सुनिए" ।
मेज़ के चारों ओर बैठे बड़े लोगों की कुहनियां घुटनों पर होती थी,नज़रें ज़मीन पर और कान रेडियो के स्पीकर की ओर ,कहीं ऐसा न हो कि देवकीनंदन पांडेय जी का कोई शब्द कानों को बाईपास करता हुआ निकल जाए ।सभी बड़े और बुजुर्गों को सर झुकाए,कुर्सियों के किनारे पर लगभग उकडू अवस्था में बैठे देख, हमे ऐसा लगता था जैसे  नाई के सैलून पर सबके बाल एक साथ काटे जा रहे हों।
हम बच्चे अपनी नंदन,पराग,चम्पक आदि बाल पत्रिकाएं पढ़ने का उपक्रम करते थे क्योंकि समाचारों में हमारी कोई रुचि न होती थी, न ही हमारी समझ में आते थे। बस एकाध खेल समाचार कभी कभी कानों में पड़ते तो हमारे भी कान थोड़े फड़फड़ा जाते थे। हमारा पालतू कुत्ता भी वक्त की नज़ाकत को समझते हुए पंजों पर थूथन रख,दुम दबाए,बिना कूं कां किये हमारे पास दुबक जाता था। उसे पता था कि यदि ज़रा भी आवाज़ निकली तो बेभाव की पड़ सकती है।वैसे भी कुत्ते इंसानों का मनोविज्ञान इतना ज्यादा समझते है, जितना कि इंसान शायद अपनी प्रजाति के इंसानों का भी नही समझता ।
समाचार खत्म होने के बाद बड़े लोगों में वर्तमान हालातों पर राजनैतिक बहस शुरू होती थी। क्यों कि समाचारों  के दौरान पांडेय जी का ऐसा आतंक था कि कोई चूं भी नही करता था, कहीं उस धीर-गम्भीर, गुरुतर, झन्नाटेदार आवाज के स्वामी  का वैसा ही भारी हाथ रेडियो से बाहर निकल कर किसी पर पड़ न जाये। हम तो डर के मारे अपनी किताबों में नज़रे गड़ाये  रेडियो की तरफ देखते भी नही थे,कहीं पांडेय जी की घूरती आंखे हमसे कोई सामान्य ज्ञान का प्रश्न न पूछ बैठें।सामान्य ज्ञान के नाम पर हमारा रटा रटाया ज्ञान,भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी,राष्ट्र्पति श्री वी वी गिरी, भारत की राजधानी नई दिल्ली और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक ही सीमित था,वो भी प्रश्नों के उसी क्रमांक के अनुसार।मतलब यदि कोई पहला प्रश्न ,तीसरे नंबर पर पूछ लेता तो हम यही कहते कि भारत की प्रधानमंत्री नई दिल्ली है। हम अक्सर मनाते कि आज देवकी नंदन पांडेय जी छुट्टी पर हों तो पौने नौ के  कर्फ्यू से छूट मिल जाये,परंतु ऐसा कभी हुआ नहीं।और कभी हुआ भी  हो तो उनकी जगह रामानुज प्रसाद सिंह समाचार पढ़ देते थे।उनकी आवाज़ भी कम प्रभावशाली नही थी। कुल मिला कर देवकी नंदन पाण्डेय जी की काल्पनिक छवि हमारे मानस में,हिंदी के गुरु जी के समरूप थी,जो जितना अच्छा पढ़ाते थे उतनी ही अच्छी तरह कान भी खींचते थे। दुर्भाग्यवश उनकी वास्तविक छवि हमने वर्ष  2001 में

 दूरदर्शन पर देखी, जब वो हमारे बीच नही रहे थे। जैसी उनकी रौबीली आवाज़ थी वैसा ही शानदार व्यक्तित्व भी।
भले ही आज पांडेय जी पंच तत्व में विलीन हो चुके हैं किंतु उनकी आवाज़ आज  भी कानों में गूंजती है "ये आकाशवाणी है,अब आप देवकी नंदन पांडेय से समाचार सुनिए"।
ये आवाज़ अमर रहेगी,जिसने हिंदी समाचार वाचन को एक नई दिशा दे कर  शीर्ष पर पहुंचाया। जिन्होंने उनकी आवाज़ नही सुनी ,मेरा सुझाव है कि एक बार you tube पर अवश्य सुनें। यकीन कीजिये कि मेरे वक्तव्य में तनिक भी अतिशयोक्ति नही है।
पहले बड़े परिवारों और छोटे घरों में सिर्फ रेडियो और भगवान का स्थान निश्चित और अचल होता था, बाकी जिसे जहां जगह मिलती समा जाता,खासकर बच्चे। कितने भी मेहमान आ जाएं, घर के छोटे होने का कभी अहसास नही होता था । संध्या की आरती और सांध्य- समाचार व हवामहल जैसे रेडियो कार्यक्रम,एक पारिवारिक समारोह जैसे होते थे जिसमे घर का हर सदस्य इन दो निश्चित स्थानों पर एकत्रित होता था।
समय के साथ साथ घर बड़े होते गए और परिवार छोटे। सपने बड़े होते गए,दिल छोटे। पहले घरों में एक रेडियो होता था और एक पूजा घर।बाद में बड़े रेडियो की जगह छोटे ट्रांजिस्टरों ने ले ली। लिहाज़ा,बड़े घरों में रेडियो भी अपने अपने हो गए और भगवान भी अपने अपने। जिन घरों में सिर्फ रेडियो और भगवान का ही स्थान निश्चित हुआ करता था, वहां अब सबके स्थान सुनिश्चित हो गए थे , सिर्फ  ट्रांजिस्टर और भगवान ही सुविधानुसार स्थानांतरित होते रहते थे ।

  मैं क्वालालम्पुर से जसदेव सिंह बोल रहा हूँ।ये आवाज  गूंजते ही हम सब दोस्तों के कान ट्रांज़िस्टर के थोड़े और नज़दीक आ गए । समय था वर्ष 1975, तीसरा हॉकी वर्ल्ड कप फाइनल,भारत और पाकिस्तान के बीच,मलेशिया की राजधानी क्वालालम्पुर में। हिंदी में आंखों देखा हाल सुना रहे थे हॉकी कमेंट्री के जादूगर जसदेव सिंह। जैसे जैसे मैच आगे बढ़ा हम लोगों की सांस ऊपर नीचे होती रही। ऐसा लग रहा था कि हम स्टेडियम में बैठ कर मैच देख रहे हैं ।जसदेव सिंह की ओजपूर्ण आवाज़ में,मोतियों से पिरोये हिंदी के शब्दों की प्रवाहमयी भाषा द्वारा वो आंखों देखा हाल हम लोग कभी नही भूल सकते।गेंद के साथ जसदेव सिंह की जिव्हा चिपकी रहती थी,जैसे एक ज़माने में ध्यानचंद की स्टिक से हॉकी की गेंद। मजाल है कि कहीं ज़ुबान लड़खड़ा जाए या हिंदी के किसी शब्द का  उच्चारण गलत हो जाये।जब मैच के आखिरी क्षणों में अशोक कुमार ने विजयी गोल किया और रेफ़री की फाइनल सीटी बजते ही भारत 2 -1 से जीत कर विश्व विजेता बन गया, तो उन क्षणों की गवाही जसदेव की रुँधी हुई,भरे गले से निकली कमेंट्री ने दी।लेकिन उन भावुक पलों में भी उनकी भाषा का तारतम्य और प्रवाह कहीं टूटा नही था।उस विजय के, जसदेव सिंह के वर्णन से हम मित्रों का गला भी भर आया था और आंखें  नम हो उठी थीं। आज भी  टेलेविज़न पर  मैचों के सीधे प्रसारणों में,  शायद हम वह नही देख पाए,जो जसदेव सिंह की जादू भारी आवाज़ ने उस दिन हमें दिखा दिया था। ऐसे थे जसदेव सिंह जिन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे राष्ट्रीय पुरुस्कारों से भी नवाज़ा गया था और ओलिंपिक का सर्वश्रेष्ठ पुरुस्कार Order of Olympic भी मिला।जसदेव सिंह ने न केवल हॉकी विश्व कप,बल्कि कई ओलिंपिक खेलों और  एशियन गेम्स की कमेंट्री को भी अपनी जादुई आवाज़ से जीवंत बनाया। इसके अलावा वर्षों तक गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस  के राष्ट्रीय समारोह का भी आंखों देखा हाल सुनाया। हम दोस्तों ने जसदेव सिंह की आवाज़ सुनी थी, लेकिन वे दिखते कैसे हैं इसका हमे कोई अंदाज़ा नही था। वर्ल्ड कप फाइनल के कुछ दिनों बाद किसी स्पोर्ट्स मैगज़ीन में एक सिख व्यक्ति की तस्वीर के नीचे  "हॉकी कमेंट्री के जादूगर जसदेव सिंह" लिखा देख हम हैरान रह गए ...कोई सरदार इतनी शुद्ध धाराप्रवाह हिंदी बोल सकता है, ये हमने सपने में भी नही सोचा था। हम दौड़ कर सबसे पहले अपने अभिन्न मित्र मंजीत सिंह उर्फ हैप्पी के घर गए । ज्यादातर सरदार बच्चों के निक नेम 'हैप्पी' ही हुआ करते हैं। हैप्पी पर जसदेव सिंह के सिख होने का रहस्य उजागर करने पर है उसने  अपनी विशिष्ट पंजाबी शैली में हमारे नाम के आगे और पीछे विशेषण लगा कर फटकारा कि सरदारों पर जोक्स तक तो ठीक है पर ऐसा मज़ाक अच्छी बात नही है। सबूत हम साथ ले गए थे जिसे प्रस्तुत करने पर उसे यकीन हुआ कि जसदेव सिंह वास्तव में सरदार ही हैं। उसके बाद सड़क पर ही हमने इस खबर को बिना म्यूजिक के, बल्ले बल्ले करते हुए ,भांगड़ा स्टाइल में सेलिब्रेट किया। हैप्पी ने बहुत ही मासूमियत से पूछा "अब तो तुम सरदारों पर चुकुले नही छोड़ोगे न ! "
हैप्पी की बात तब बाल सुलभ मन को लग गई थी ,वो आज तक दिल में लगी हुई है।तब हम छोटे थे,मन में भाव थे लेकिन कहने को शब्द नही थे।लेकिन आज मैं समय के साथ खोये हुए अपने लंगोटिया यार को कहना चाहता हूं कि हैप्पी ! अपने ऊपर वही हंस सकता है जो निश्छल होता,साहसी होता है और खुले हृदय का होता है।सरदार  अपने खुद के चुटकुलों पर खुल कर हंसते हैं तो ये उनके स्वभाव का बड़प्पन दर्शाता है।खेल भावना दिखाता है। आश्चर्य नही की 1975 की विश्व विजेता टीम के आधे से ज्यादा खिलाड़ी सरदार थे और उनका नेतृत्व कर रहे थे अपने समय के सर्वोत्तम सेंटर हाफ अजीतपाल सिंह। आजकल तो चुटकुले भी धर्म,सम्प्रदाय,वर्ण और जातियों में बंट कर रह गए है और लोग मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं।
जसदेव सिंह के प्रभाव ने आज वो सब कहलवा दिया जो मैं अपने बचपन के दोस्त मंजीत सिंह "हैप्पी" से उस समय कहना चाहता था।

आवाज़ों की बात हो और उस बहती हुई आवाज़ का ज़िक्र न हो जिसने हर बुद्धवार रात आठ बजे से पहले पूरे परिवार के सदस्यों को अपने अपने रूटीन काम निपटा कर एक घंटे के लिए एक जुट होने को बाध्य कर दिया था....! 

जी हां भाइयों और बहनों ...आप सही सोच रहे हैं ...मैं बात कर रहा हूँ रेडियो सीलोन से प्रसारित होने वाली बिनाका गीत माला के एंकर "अमीन सयानी" साहब की जिनका नाम बिनाका गीत माला का पर्याय बन चुका था ..

हर बुद्धवार रात पौने आठ बजे से रेडियो के इर्द गिर्द हलचल मचनी शुरू हो जाती थी I  रेडियो ट्रांसिस्टरों  के एरियल दुरुस्त करने के साथ शार्ट वेव पर रेडियो सीलोन सेट कर दिया जाता था, घर के सभी सदस्यों का  खाने से लेकर बच्चों का होमवर्क तक आठ बजे से पहले खत्म हो जाता था । ठीक आठ बजे रेडियो पर एक आवाज़ गूंजती थी " बहनों और भाइयों !! मैं आपका दोस्त अमीन सयानी एक बार फिर से ले कर आया हूँ बिनाका गीत माला "और उसके बाद शुरू होती थी एक घंटे की पारिवारिक रोलर कोस्टर राइड जिसमें पायदान,रिकॉर्डों की बिक्री,श्रोता संघों की राय,सरताज गीत जैसे उस समय के सर्वाधिक लोकप्रिय शब्दों का प्रयोग कर  अमीन सयानी नामक आवाज़ का ये जादूगर सबको अचंभित करता रहता था। शायद ये हिंदी फिल्मी गीतों का पहला काउंट डाउन प्रोग्राम था, जिसने देश के मानस पर कई दशकों तक राज किया। हफ्ते,महीने और पूरे साल के सबसे लोकप्रिय गानों को बिनाका गीत माला में अमीन सयानी अपनी मखमली आवाज़ में मोतियों सा ऐसा पिरोते थे कि एक घंटे के उस कार्यक्रम में घर का कोई सदस्य हिलता तक नही था। भाइयों बहनों में शर्त लगा करती थी कि इस हफ्ते का सरताज गीत कौन सा होगा जिसको बजाने से पहले अमीन सयानी बिनाका गीत माला का चिरपरिचित बिगुल बजवाएँगे। उस बिगुल की आवाज़,इक्कीस तोपों की सलामी से भी ज्यादा सम्मानजनक मानी जाती थी। 

अमीन सयानी सिर्फ एक रेडियो जॉकी नही थे,बल्कि जैसे परिवार के सदस्य थे। हर श्रोता को लगता था कि वो उसी से बातें कर रहे हैं। इसीलिए परिवार में वो अमीन भाई या अमीन अंकल के नाम से संबोधित किये जाते थे। हर गाने के साथ एक कहानी,उनकी ज़ुबानी होती थी और जब वो बताते ये गाना दस पायदानों की लंबी छलांग लगा कर इस हफ्ते का सरताज गीत बना है तो हम भगवान से यही मनाते थी कि गाना आने से पहले रेडियो के सिगनल कट न जाएं क्योंकि रेडियो सीलोन को  शॉर्टवेव पर लगातार  ट्यून रखना एक दुष्कर कार्य होता था। 

हर वर्ष दिसंबर के आखिरी सप्ताह में उस साल के टॉप गाने बजाए जाते थे और आखिर में बजता था उस साल का सबसे लोकप्रिय गीत ,जिसे सुनने,जानने की जिज्ञासा अपने चरम पर होती थी। बिनाका गीत माला का वार्षिक कार्यक्रम किसी पाक दरगाह के सालाना उर्स की तरह होता था, जिसमे हर जायरीन शिरकत करने चाहता था। 

कुछ अलग अलग वर्षों के साल के शीर्ष गाने जो अभी बेतरतीब क्रमांक में ज़ेहन में आ रहे है ..वो थे "बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है,दिल विल प्यार व्यार में क्या जानू रे, ज़िंदगी एक सफर है सुहाना,दम मारो दम, यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी आदि" 

 अमीन साहब शतायु हों ये मेरी ईश्वर से प्रार्थना है। उनकी सदाबहार,मनमोहक और दिलकश आवाज़ की रवानी सदैव बनी रहे।

अलग विधाओं के,अलग प्रान्तों के और अलग मज़हबों के ये तीन महारथी, दशकों तक तिरंगे के समान अपनी आवाज़ का परचम फहराते रहे और अपनी ईश्वरीय अनुभूति वाली वाणी से आज तक हम भारतीयों के हृदय में विशिष्ट स्थान बनाये हुए हैं।

जनाब बशीर बद्र साहब की दो पंक्तिया देवकी नंदन पांडेय,जसदेव सिंह और अमीन सयानी को समर्पित है ....
गले  में उसके, ख़ुदा की अजीब बरकत है,
वो बोलता है तो इक रौशनी सी होती है ।

आपका जीवन सदैव सुमधुर संगीत की तरह आनंदमय रहे,और आपकी आवाज भी आपकी पहचान बने,इसी आकांक्षा के साथ….

.... अतुल

Friday, 8 May 2020

उच्चारण का अंकगणित - Arithmatic of Pronunciation

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कोरोना जनित  लॉक डाउन से भी काफी पहले की बात है।पारिवारिक डिनर से लौटते समय बीवी ही नहीं बच्चों के भी चेहरे पर एक अजीब सी नाराज़गी थी।गाड़ी चलाते समय हम सोचने लगे कि आखिर आज कहाँ चूक हो गई हमसे। छुरी कांटे भी हमने सही हाथों में पकड़े थे,नैपकिन और कपड़ों पर कुछ गिराया भी नही,टेबल पर कोहनी भी नही रखी,चप चप की आवाज़ किये बिना मुँह बंद कर के खाया ।खाते समय ठहाके भी नही लगाए।मतलब ,हर वो चीज़ करी, जो किसी भी अच्छे खाने को बेस्वाद बना देती है।खाने के बाद फिंगर बोल का भी सही इस्तेमाल किया था। पीने के पानी में सलाद वाला नींबू भी निचोड़ कर नही पिया ।फिर कौन सा अनर्थ हो गया कि सबके चेहरे सूजे हुए हैं ।
घर पहुंच कर हमने कुरेदा कि हमसे कौन सी गुस्ताखी हो गयी रेस्टोरेंट (Restaurant) में कि सब नाराज़ से दिख रहे हैं । बिटिया बोली कि ..पापा, पहले तो ये रेस्टोरेंट बोलने की आदत छोड़िए, कितनी बार बताया है कि रेस्ट्रॉन्ट बोला जाता है । हमने अपनी गलती तुरंत स्वीकार ली ,कि मामला रफ दफा हो और सबका मूड ठीक हो जाये।कोई और दिन होता तो हम ये कुतर्क जरूर करते कि क्या रेस्ट्रॉन्ट का खाना रेस्टोरेंट से ज़्यादा स्वादिष्ट होता है या फिर रेस्ट्रॉन्ट बोलने पर कम बिल देना पड़ता है।क्योंकि बात अभी खत्म नही हुई थी,असली बात अभी बाकी थी इसलिए हम मौनी बाबा बन के शून्य में ताकने लगे।
इसके बाद बेटे ने कमान संभाली ..इन्ही सब से तो बेइज्जती करा देते हैं पापा सबके सामने ,सब लोग हमें ही घूर रहे थे कि कहाँ के गंवार हैं ... !!
सारा घटना  क्रम हमारी आंखों के आगे घूम गया।दरसल हमे सिरके वाली प्याज़ बहुत पसंद है, तो हमने पास जाते हुए वेटर से ज़रा जोर से कह दिया कि थोड़ी विनेगर वाली ओनियन लाना।हमारे बच्चों सहित कई अन्य लोगों ने हमे घूर कर देखा।हम समझे थे शायद हमारी आवाज़ कुछ तेज थी जिससे सब हमे घूर रहे हैं लेकिन अब हमें समझ आया कि हमने अनियन को ओनियन कहने की महा धृष्टता कर दी थी जो संभ्रांत लोगों के लिए पाप और गहन अपराध की श्रेणी में आता है। अगली गलती हमने टमाटर की सॉस मांग कर कर दी थी जिसे पढ़ा लिखा वर्ग आजकल टमैटो केचप के नाम से पुकारता है । इन दो बड़ी गलतियों के लिए हमने तुरंत सबसे बिना शर्त माफ़ी मांगी और आगे से कभी ऐसी गलती न करने का वादा किया। हमने मन में संकल्प लिया कि आज से ही अनियन और टमैटो केचअप खाना बंद।पता नही कब,क्यों और कहां फिर से  उच्चारण का गणित गलत हो जाये और परिजनों के कोप का भाजन बनना पड़े। ज़िंदगी इन चीजों को खाये बिना भी गुलज़ार रह सकती है।
बहुत साल पहले की बात है,हमारे जीवन की  पहली विदेश यात्रा थी। जिगरी दोस्तों की फ़रमाइश थी कि लौटते समय ड्यूटी फ्री से एक बोतल शैम्पेन अवश्य लाई जाए।दोस्तो के आदेशानुसार लौटते समय हम एयरपोर्ट की सबसे बड़ी ड्यूटी फ्री शॉप पर शैम्पेन लेने पहुंच गए।पूरी शॉप छान मारी पर शैम्पेन कहीं नही दिखी।हमने डरते डरते काउंटर पर पूछा कि शैम्पेन कहाँ रखी है।उसने इशारा कर के बता दिया।वहां हम पहले ही दो चक्कर लगा चुके थे।फिर भी वहां पहुंच कर  हमने ढूंढा तो शैम्पेन हमे फिर नही दिखी।आखिर काउंटर छोड़ कर वो बंदा हमारे पासआया और शैम्पेन दिखाई।दरसल उस पर Champagne लिखा था जिसे हम बार बार  'चम्पागनी'  पढ़ कर आगे बढ़ जाते थे।इंटरनेट का जमाना तो था नहीं कि सर्च कर ली सही चीज़...
ये फ्रेंच भाषा तो अंग्रेज़ी  से भी कहीं आगे है । फ्रेंच में जो लिखते हैं वो पढ़ते नहीं,जो पढ़ते हैं वो बोलते नहीं, जो बोलते है वो समझ नहीं आता। हम तो आज तक  Chanel परफ्यूम को चैनल ही कहते है,अब फ्रेंच लोग हमारे 'शनेल' न बोलने से बुरा मानें तो हमारी बला से।कौन सा हमे पेरिस में अपार्टमेंट गिफ्ट कर रहे हैं वो। हम Gucci को गुक्की कहें तो इटालियन को बुरा नही मानना चाहिए कि हमने 'गूची' क्यों नहीं बोला। लिखो तुम कुछ भी और गंवार हम ठहरे।ऐसा नही चलेगा।एक और ब्रांड है Louis Vuitton।अब आप इसे लुईस विटोन ही तो पढ़ेंगे न। अपनी हंसी उड़वानी है तो ज़रूर पढ़िए क्योंकि संभ्रांत लोग इसे लुई वतां कहते हैं।वास्तव में ये वतां है, वितों है या फिर विटों है या कुछ और है ...इसके बारे में शायद Louis Vuitton वाले भी न बता पाएं। इस टॉप ब्रांड के एक सबसे  साधारण बैग की कीमत है लगभग ढाई लाख रुपये और साइज इतना कि 5 किलो आलू और एक फूलगोभी न समा पाए इसके अंदर ।आलू की वर्तमान कीमत  20 रुपये प्रति एक किलो भी लगा लें तो इस LV के झोले की कीमत में साढ़े बारह टन आलू आ जाये। इससे अच्छा झोला तो हमारा दर्जी हमारी पुरानी पैंट को काट कर बना देता था। इससे ज्यादा मजबूत भी।हम कहते तो वो इस पर LV का logo भी काढ़ देता। यू .पी. वालों का, हिसाब किताब समझाने का यही तरीका होता है,अंग्रेज़,इतालवी या फ्रांसीसी बुरा माने या भला।
वैश्विक संकट,महामारी या भुखमरी के समय पाँच किलो आलू की कीमत ऐसे बैगों से ज्यादा होती जाती  है और वही एक एकलौता समय होता है जब पांच किलो आलू उगाने वाला, इन बैग बनाने वालों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है । द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ऐसा ही हुआ था।
अंग्रेज़ी शब्द भी उच्चारणों को फैशन के अनुसार बदलते रहते हैं । शेड्यूल(Schedule) से  स्केज्यूल,गेस्चर( Gesture) से जेस्चर और सिचुएशन (Situation) ने कब सिटुएशन का जामा पहना लिया, पता ही नही चला।सबसे बड़ा धोखा तो एनट्रप्रेन्योर (entrepreneur) ने दिया ,ये कब धर्मपरिवर्तन कर  ऑनटोप्रेंनहो हो गया कोई समझ ही न पाया।जो लोग पुराने उच्चारणों से चिपके हुए हैं उन्हें गंवार समझा जाता है आजकल।
हमारे हम उम्रों या उनसे भी पहले और बाद की पीढ़ी को  अंग्रेज़ी सीखने की  बेस्टसेलर किताब रैपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स याद होगी।जिसका प्रचार प्रसार हम सब के प्रिय क्रिकेटर कपिल देव किया करते थे।कहते हैं कि भारतीय टीम का कप्तान बनने के बाद,मैच जीतने के बाद,अंग्रेज़ी में कप्तानी  इंटरव्यू  देने में इस किताब ने काफी सहयोग दिया था। ये भी कहा जाता है कि पाकिस्तानी टीम बेहतर होने के बावजूद मैच हारने को प्राथमिकता देती थी क्योंकि मैच जीतने पर,इंटरव्यू देते हुए,उनके कप्तान पंजाबी उर्दू मिश्रित अंग्रेज़ी बोलते समय काफी हास्यास्पद हो जाते थे  । तो साहब,अंग्रेज़ी के आतंकवाद से तो पाकिस्तानियों  के हौसले भी पस्त थे।
पहले रोडवेज़ की बसों में भी अंग्रेज़ी सीखने की सस्ती किताबें खूब बिकती थी।किताबे बेचने वाले अपनी लच्छेदार भाषा में हिंदी भाषियों की  अंग्रेज़ी तंगहाली को खूब भुनाते थे। मेरे एक ठेठ हिंदीभाषी प्रबुद्ध मित्र की वर्तमान में धाराप्रवाह अंग्रेज़ी, ऐसी ही बस यात्राओं में किताबें बेचने वाले के यादगार कवित्तपूर्ण तरीके पर आधारित है... बानगी देखिए

"Pigeon कबूतर,उड़न Fly ,
Look  देखो, आसमान Sky । "

सारी बस की सवारियों को अंग्रेजी के उच्चारण से लेकर,शब्दार्थ तक सब समझ में आ जाते थे और उसकी सारी किताबें हाथों हाथ बिक जाती थी।
वर्तमान में हम और हमारी अगली पीढ़ी, हिंदी या अपनी मातृभाषा के शब्दों को गलत उच्चारित करने में शर्म नही बल्कि गर्व महसूस करते हैं। बस अंग्रेज़ी का pronunciation गलत नहीं होना चाहिए। मातृभाषा के अलावा किसी अन्य भाषा को जानना बहुत ही अच्छा  है,लेकिन मातृभाषा की उपेक्षा  वास्तव शर्म की बात है।
हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाएं बहुत समृद्ध हैं क्योंकि ज़्यादातर का संबंध देवभाषा संस्कृत से है।हमारी भाषाओं की विशेषता ये है कि जो लिखा जाता है,वही पढ़ा जाता है,वही उच्चारित होता है और वही समझा जाता है।विश्व की कम भाषाएं ही इतनी समृद्धशाली हैं।हमे गर्व है अपनी भारतीय भाषाओं पर और उनके समृद्धशाली शब्दकोशों पर ।
लॉक डाउन में आप और आपका परिवार ,किसी भी भाषा का अच्छा साहित्य पढ़ कर और भी समृद्ध  हों।
आपके और आपके परिवार के उत्तम स्वास्थ्य व बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाओं  सहित ..
....अतुल
07.05.2020